Tuesday, August 2, 2011

रात

दिन का सदमा झेल चूका जब रात को घर लौट आये,
और तारे चमके, निंदिया बिखरे, सिराहना सिमट न पाए,
बादल बिसरे और मेघा तनहा चादर पर शीत लेहर बरसाए,
उठ खड़ा शरीर नीली रतिया मैं बह जाये.

अवाज़ फिजा की कानो मैं कोयल सी यह कह जाये - जो है अभी है - कल यह नहीं है - सूरज सब ले जाये.

रात में तू सपने ना देख, जब रतिए सावन सहलाये.

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